दिल्ली/इराक:(जीशान मलिक)आज से करीब 1400 साल पहले, सन 61 हिजरी में इस्लाम के इतिहास की सबसे दर्दनाक और प्रेरणादायक जंग कर्बला के मैदान में लड़ी गई थी। यह कोई सत्ता की लड़ाई नहीं थी। यह जुल्म के खिलाफ इंसाफ, झूठ के खिलाफ सच और तानाशाही के खिलाफ हक की आवाज थी। इसी कुर्बानी की याद में दुनिया भर में मुहर्रम मनाया जाता है।हजरत मोहम्मद साहब के वफात के बाद इस्लामी हुकूमत में खलीफाओं का दौर चला। चौथे खलीफा हजरत अली के बाद मुआविया शाम के शासक बने। मुआविया की मौत के बाद उनके बेटे यजीद ने जबरन गद्दी संभाल ली। यजीद के अंदर वे तमाम अवगुण थे जो इस्लामी शासक में नहीं होने चाहिए। शराब, जुआ, जुल्म और इस्लामी उसूलों की खुली मुखालफत उसकी पहचान थी।
यजीद को अपनी हुकूमत को जायज ठहराने के लिए इमाम हुसैन की बैअत चाहिए थी। इमाम हुसैन हजरत मोहम्मद साहब के नवासे और हजरत अली व फातिमा के बेटे थे। पूरे अरब में उनकी दीनदारी, सचाई और किरदार की मिसाल दी जाती थी। यजीद जानता था कि अगर हुसैन ने उसे खलीफा मान लिया तो पूरी उम्मत मान लेगी।इमाम हुसैन ने दो टूक में कहा: “मैं तुझ जैसा यजीद की बैअत नहीं कर सकता।” उन्होंने साफ कर दिया कि यजीद की हुकूमत इस्लाम के बुनियादी उसूलों के खिलाफ है। लेकिन इमाम हुसैन मदीना में खून-खराबा नहीं चाहते थे। अमन के लिए उन्होंने 28 रजब 60 हिजरी को हमेशा के लिए नाना का शहर मदीना छोड़ दिया। साथ में उनका परिवार था- बीवियां, बहन जैनब, बेटे अली अकबर, अली असगर, बेटियां और करीब 72 साथी।
कूफा वालों ने इमाम हुसैन को सैकड़ों खत लिखकर बुलाया कि आप आएं, हम आपके साथ हैं। इमाम हुसैन कूफा के लिए रवाना हुए। लेकिन रास्ते में ही खबर मिली कि कूफा के लोगों ने यजीद के गवर्नर उबैदुल्लाह इब्ने जियाद के डर से धोखा दे दिया है। इमाम के सफीर मुस्लिम बिन अकील को शहीद कर दिया गया। 2 मुहर्रम 61 हिजरी को इमाम हुसैन का काफिला कर्बला के मैदान में पहुंचा। यहीं यजीद की 4000 की फौज ने उन्हें घेर लिया। कमांडर हुर ने रास्ता रोका। इमाम ने कहा, “मुझे जाने दो, मैं वापस हिजाज चला जाऊंगा या किसी सरहद पर चला जाऊंगा।” लेकिन हुक्म था कि या तो बैअत करो या जंग के लिए तैयार हो जाओ। 
इमाम हुसैन ने फुरात नदी के किनारे खेमे लगा दिए। 7 मुहर्रम को यजीदी फौज के कमांडर अम्र बिन हज्जाज ने 500 सवारों के साथ नदी पर पहरा बिठा दिया। इमाम के खेमों में छोटे-छोटे बच्चे थे। 6 माह के अली असगर प्यास से तड़प रहे थे। 7, 8, 9 मुहर्रम- तीन दिन तक एक बूंद पानी नसीब नहीं हुआ। गर्मी में इराक का तापमान 50 डिग्री के पार था। रेत तप रही थी।9 मुहर्रम की शाम यजीदी फौज ने हमले का एलान किया। इमाम हुसैन ने एक रात की मोहलत मांगी। पूरी रात इबादत, तिलावत और दुआ में गुजरी। इमाम ने अपने साथियों से कहा, “ये लोग सिर्फ मुझे चाहते हैं। अंधेरा है, तुम सब चले जाओ।” लेकिन 72 जानिसारों ने कहा, “मौला, हम आपको छोड़कर जन्नत भी नहीं जाएंगे।”
सुबह फज्र के बाद जंग शुरू हुई। इमाम के साथी एक-एक कर मैदान में गए। हजरत अब्बास, जो इमाम के भाई और अलमबरदार थे, बच्चों के लिए पानी लेने गए। फुरात तक पहुंचे, मश्क भरी, पर खुद पानी नहीं पिया। लौटते वक्त दुश्मनों ने दोनों बाजू काट दिए, मश्क में तीर मार दिया और शहीद कर दिया।अली अकबर, जो शक्ल-सूरत में नाना हजरत मोहम्मद से सबसे ज्यादा मिलते थे, शहीद हुए। 6 माह के अली असगर को इमाम हुसैन ने गोद में उठाकर पानी मांगा, तो हरमला ने तीर से उस मासूम का गला छेद दिया।
असर की नमाज के बाद इमाम हुसैन अकेले बचे। 33 नेजों, 34 तलवारों और अनगिनत तीरों के जख्म खाकर सजदे की हालत में शहीद हो गए। शाम होते-होते खेमों में आग लगा दी गई। औरतों और बच्चों को कैदी बना लिया गया।इस पूरी जंग में इमाम हुसैन के बेटे इमाम जैनुलआबेदीन बीमार होने के कारण बच गए। 10 मुहर्रम को बुखार में थे, इसलिए जंग में नहीं जा सके। कैद के बाद उन्हीं से हजरत मोहम्मद साहब की नस्ल आगे चली। बीबी जैनब ने यजीद के दरबार में खुत्बा देकर कर्बला का पैगाम दुनिया तक पहुंचाया।
कर्बला सिर्फ एक जंग नहीं, एक यूनिवर्सिटी है। यह सिखाती है कि तादाद मायने नहीं रखती, हक मायने रखता है। 72 लोग हजारों पर भारी पड़े क्योंकि वे सच के साथ थे। इमाम हुसैन ने कुर्बान होकर बता दिया कि “जिंदा रहना है तो यजीद की तरह मत जियो, और मरना है तो हुसैन की तरह मरो।”इसीलिए मुहर्रम गम का महीना है, पर मातम का नहीं- पैगाम का है। यह हमें याद दिलाता है कि जुल्म के आगे सिर झुकाना हराम है, चाहे जान ही क्यों न चली जाए।

