पिरान कलियर:(इसरान अली)चांद दिखने के बाद लोगों ने एक दूसरे के गले मिले और मुबारकबाद दिए.रमजान के दौरान मुस्लिम समाज के लोग 30 दिनों तक रोजा रकते है.और 5 वक्त की नमाज अदा करते है.साथ ही जकात और फितरा के रूप में गरीबों की मदद भी करते है.रमजान के पाक एवं बारकतो वाले इस महीने में जकात और फितरा का खास महत्व है.
आपको बता दे कि जकात हर मुसलमान पर फर्ज है.यह उस धन का हिस्सा होता है,जिसे इंसान अल्लाह के दिए हुए माल में से जरूरतमंदों को देता है.हर मुसलमान को अपने धन में से 2.5 फीसदी जकात देना जरूरी होता है.अगर किसी के पास तमाम खर्चों के बाद 100 रुपये बचते हैं, तो उसमें से 2.5 रुपये किसी गरीब को देना जरूरी होता है.फितरा भी रमजान में दिया जाने वाला दान है.
खाते-पीते, संपन्न घरों के लोग इसे गरीबों, विधवाओं, अनाथ बच्चों और जरूरतमंदों को देते हैं. इसे ईद की नमाज से पहले अदा करना जरूरी होता है.इस साल फितरे की रकम प्रति व्यक्ति 57 रुपये तय की गई है.
अगर कोई गेहूं देना चाहता है तो 2.45 किलोग्राम अदा करना होगा. इसमें आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पैसा, खाने-पीने का सामान या कपड़े दिए जा सकते हैं.रमजान के तीसरे अशरे में मुसलमान एतकाफ में बैठते हैं. इसे अल्लाह की खास इबादत माना गया है. पैगंबर हजरत मोहम्मद भी रमजान के आखिरी दिनों में एतकाफ में बैठते थे.
जकात को पूरे साल भर में कभी भी दिया जा सकता है लेकिन अधिकतर जकात को रमजान माह में दिया जाता है. इस माह में जकात देने से ज्यादा सवाब मिलता है.जकात का सबसे पहला फर्ज अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों पर है.रिश्तेदारों में कोई गरीब है तो उसको जकात दिया जा सकता है. पड़ोस में रहने वाले गरीब, यतीम, विधवा महिलाओं को जकात दी जा सकती है. गरीब और बेसहारा लोगों को जकात देनी चाहिए. ऐसे लोगों को जकात देना बहुत बड़ा सवाब का काम है. लोग जरूरत से ज्यादा खर्च न करें और गरीब बेसहारा लोगों की मदद करते रहें.
समाज सेवी ज़ीशान मलिक ने बताया कि रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है.पहला अशरा अल्लाह की रहमत का होता है. और दूसरा अशरा गुनाहों की माफी का होता है. एवं तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से बचने का होता है.

