Chipko चेतना यात्रा: उत्तराखंड में फिर गूंजेगी वृक्ष रक्षा की हुंकार!
हरिद्वार,मनन ढींगरा
उत्तराखंड के सुदूर जंगलों में कुछ खास होने वाला है। सदियों से खड़े पेड़ों की फुसफुसाहटों में एक नया संदेश गूंज रहा है—एक चेतावनी, एक संकल्प, एक यादगार सफर। “चिपको चेतना यात्रा”… यह कोई साधारण यात्रा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रहरी बने उन साहसी लोगों की गाथा को फिर से जीवंत करने का प्रयास है, जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर वृक्षों को कटने से बचाया था।
24 मार्च 2025, रैणी गांव, तपोवन। उत्तराखंड की विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी जब इस ऐतिहासिक यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगी, तो पहाड़ों की हवाएं भी सिहर उठेंगी। सात दिनों तक चलने वाली यह यात्रा जंगलों के बीच से गुजरते हुए 13 जिलों में एक अदृश्य संदेश फैलाएगी— “सिर साटे रुख बचे, तो भी सस्तो जान।” यह वही वाक्य है, जिसे कहकर राजस्थान की अमृता देवी विश्नोई ने वृक्षों की रक्षा में अपना बलिदान दिया था।

गूंज उठेगा पहाड़: पेड़ों से लिपट जाएंगी यादें!
1973 का वही इतिहास दोहराने की कोशिश… जब मातृशक्ति ने पेड़ों को अपना मायका मानकर उनसे लिपटकर उन्हें बचाने का प्रण लिया था। आज, फिर वही पुकार उठ रही है—“पेड़ बचाओ, धरती बचाओ!”
लेकिन इस बार खतरा और भी बड़ा है—ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और तेजी से सिकुड़ते जंगलों का साया। क्या यह यात्रा सिर्फ एक रस्म होगी या असल में कोई क्रांति लाएगी?
रहस्यमयी पड़ाव: हर रात एक नई कहानी!
24 मार्च को तपोवन से निकली यह यात्रा हर दिन एक नए पड़ाव पर पहुंचेगी, जहां कोई न कोई नया रहस्य, कोई नई सीख और कोई नया संकल्प उभरेगा—
•गोपेश्वर (24 मार्च, रात्रि प्रवास): पहाड़ों की गोद में एक गूढ़ मंत्रणा!
•चंपावत (25 मार्च): क्या यहां की नदियां कुछ कह रही हैं?
•रुद्रपुर (26 मार्च): औद्योगिकीकरण बनाम प्रकृति की जंग!
•श्रीनगर (27 मार्च): क्या यहां कोई नई क्रांति जन्म लेगी?
•उत्तरकाशी (28 मार्च): तपस्वियों की भूमि क्या नए संतों को जन्म देगी?
•हरिद्वार (29 मार्च): गंगा किनारे प्रकृति की महाआरती!
•ऋषिकेश (30 मार्च, समापन): दिव्य गंगा आरती के साथ प्रकृति रक्षा का अंतिम संदेश!
क्या यह सिर्फ एक यात्रा है, या फिर एक आंदोलन का पुनर्जन्म?
ग्रीनमैन विजयपाल बघेल की अगुवाई में, टीटीआई (ट्री ट्रस्ट ऑफ इंडिया) के संरक्षण में और सैकड़ों पर्यावरण प्रेमियों के सहयोग से यह यात्रा एक ऐसा अध्याय लिखने जा रही है, जिसे आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी। क्या यह चेतना यात्रा उत्तराखंड में नए “चिपको आंदोलन” की नींव रखेगी?
रहस्य की परतें खुलेंगी 24 मार्च से… पहाड़ों के सन्नाटे में गूंज उठेगी एक पुकार—
“पेड़ बचेंगे, तो कल बचेगा!”

