
दिल्ली:(जीशान मलिक)सूफियाना परंपरा में अपनी अलग पहचान रखने वाली ग्यारहवीं शरीफ इस बार 22 सितंबर 2026, मंगलवार को मनाए जाने की संभावना है। रबीउल आखिर की 11वीं तारीख को मनाए जाने वाले इस विशेष अवसर को हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी की याद और उनके आध्यात्मिक संदेशों के स्मरण से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन देशभर में उनके अनुयायियों की ओर से धार्मिक महफिलों, कुरआनख्वानी, फातिहा, जिक्र और दुआ के आयोजन किए जाते हैं।ग्यारहवीं शरीफ केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि सूफी परंपरा में इबादत, आध्यात्मिकता, सेवा और जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने की भावना से भी जुड़ी मानी जाती है। कई स्थानों पर घरों, मस्जिदों और खानकाहों में विशेष महफिलें आयोजित होती हैं। कुरआन की तिलावत के बाद फातिहा और दुआ की जाती है, जबकि नयाज और तबर्रुक का वितरण भी परंपरा का हिस्सा माना जाता है।ग्यारहवीं शरीफ का नाम ही इसके आयोजन की तारीख से जुड़ा है। रबीउल आखिर महीने की 11वीं तारीख को हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी की याद में होने वाले आयोजन को भारतीय उपमहाद्वीप में ‘ग्यारहवीं शरीफ’ के नाम से जाना जाता है। सूफी परंपरा में उन्हें गौस-ए-आजम के नाम से भी जाना जाता है।


” कौन थे हजरत अब्दुल कादिर जीलानी?

हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी इस्लामी इतिहास में प्रसिद्ध विद्वान, फकीह, उपदेशक और सूफी संत के रूप में जाने जाते हैं। उनका जीवन बगदाद से गहराई से जुड़ा रहा। धार्मिक शिक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण उनकी शिक्षाओं का प्रभाव समय के साथ दूर-दूर तक पहुंचा।उनसे संबंधित कादिरिया सूफी सिलसिला बाद की सदियों में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैला। भारतीय उपमहाद्वीप में भी इस सिलसिले से जुड़ी खानकाही और आध्यात्मिक परंपराओं की मजबूत उपस्थिति रही है।
“महफिलों में होगा जिक्र!
ग्यारहवीं शरीफ के मौके पर आयोजित होने वाली धार्मिक महफिलों में कुरआनख्वानी, जिक्र और दुआ के साथ हजरत अब्दुल कादिर जीलानी की शिक्षाओं और आध्यात्मिक जीवन का उल्लेख किया जाता है।इस अवसर पर तैयार की गई नयाज लोगों में बांटी जाती है। गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन कराना भी कई स्थानों पर विशेष परंपरा के रूप में निभाया जाता है। यही वजह है कि ग्यारहवीं शरीफ को धार्मिक आस्था के साथ-साथ सेवा और आपसी भाईचारे का अवसर भी माना जाता है।
“बगदाद की दरगाह से जुड़ी है गहरी आस्था!!
हजरत अब्दुल कादिर जीलानी की दरगाह बगदाद में स्थित है। उनके अनुयायियों के लिए यह प्रमुख जियारत स्थलों में से एक मानी जाती है। सदियों से उनके नाम से जुड़ी आध्यात्मिक परंपरा विभिन्न देशों और समाजों में अपने अलग-अलग रूपों में आगे बढ़ती रही है।
” चांद के अनुसार तारीख में हो सकता है बदलाव..
इस्लामी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित होने के कारण ग्यारहवीं शरीफ की अंग्रेजी तारीख हर वर्ष बदलती रहती है। वर्ष 2026 में 22 सितंबर की तारीख संभावित मानी जा रही है, हालांकि स्थानीय चांद के दिखाई देने और संबंधित हिजरी कैलेंडर के अनुसार एक दिन का अंतर संभव है। इसलिए धार्मिक आयोजन करने वाले लोग स्थानीय स्तर पर चांद की पुष्टि और मान्य हिजरी कैलेंडर को अंतिम आधार मानते हैं।ग्यारहवीं शरीफ का संदेश यही माना जाता है कि इबादत के साथ इंसानियत, जरूरतमंदों की मदद और भाईचारे को भी जीवन का हिस्सा बनाया जाए।

