
देहरादून:(जीशान मलिक)सनातन परंपरा की महान पदयात्रा परंपरा को आगे बढ़ाते हुए टिहरी गढ़वाल के भांगला गांव, दोगी पट्टी निवासी डॉ. ज्योति प्रसाद गैरोला ने 35 दिनों में लगभग 1600 किलोमीटर की शास्त्रोक्त पदयात्रा पूर्ण की। इस दौरान उन्होंने उत्तराखण्ड के चारधाम, पंचकेदार और पंच बदरीनाथ के दर्शन किए।आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में भारत के चार धामों की पदयात्रा कर धर्म को संगठित किया था। इसके बाद 1880 में काली कमली वाले स्वामी विशुद्धानंद महाराज ने चारधाम यात्रा मार्ग पर प्याऊ, धर्मशाला और चट्टियों का निर्माण कराया। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए डॉ. गैरोला ने यह कठिन पदयात्रा पूरी की।सनातन परंपरा में ऐसी पदतीर्थ को आत्मशुद्धि, मानसिक शांति, पुण्य और मोक्षदायिनी माना गया है।
“चारधाम, पंचकेदार, पंच बदरी का महत्व”
यमुनोत्री में स्नान से यमराज का भय दूर होता है। गंगोत्री में राजा भागीरथ की तपस्या से मां गंगा पृथ्वी पर आईं। केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है और बदरीनाथ भगवान विष्णु का प्रमुख धाम है।महाभारत के बाद पांडवों को दर्शन देने के लिए भगवान शिव के अंग पांच स्थानों पर प्रकट हुए।केदारनाथ – कूबड़, मध्यमहेश्वर – नाभि, तुंगनाथ – भुजाएं, रुद्रनाथ – मुख, कल्पेश्वर – जटाएं। भगवान विष्णु के पांच स्वरूप: विशाल बदरी, योगध्यान बदरी, भविष्य बदरी, वृद्ध बदरी और आदि बदरी।
डॉ. गैरोला ने कहा कि चारधाम, पंचकेदार और पंचबदरी की पदयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह श्रद्धा, तप, संयम और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है। “अपनी जन्मभूमि उत्तराखण्ड में यह यात्रा करना वर्षों पुरानी इच्छा थी, जो बाबा केदार, बदरी विशाल, मां गंगा और मां यमुना की कृपा से पूरी हुई।”इस यात्रा में मार्गदर्शन के लिए उन्होंने गुरु प्रो. अशोक थपलियाल, पंकज सती, मनोज विजल्वान और सभी मित्रों का आभार व्यक्त किया।


