पलायन या समाधान? उत्तराखंड की पहाड़ियों से उठी एक चेतावनी… संसद में गूंजा एक गंभीर सवाल!
नई दिल्ली:अंशुल बसनेत भगवा सनातन टाइम्स संवाददाता
संसद के सत्र में एक आवाज ऐसी गूंजी, जो सिर्फ एक मांग नहीं थी—बल्कि वह एक चेतावनी थी… उत्तराखंड की शांत दिखने वाली पर्वत श्रृंखलाओं में एक ऐसा संकट पनप रहा है, जो न केवल किसानों की आजीविका बल्कि देश की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर सकता है।
हरिद्वार से सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने देश की सर्वोच्च पंचायत में वह मुद्दा उठाया, जो अब तक अनदेखा था, परंतु असर इसका व्यापक हो सकता है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में खेती की जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट चुकी है। नतीजा? किसान आधुनिक कृषि तकनीकों से दूर होते जा रहे हैं, उत्पादन घट रहा है, और कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है।

लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
रावत ने चेतावनी दी—अगर अब भी हमने इन क्षेत्रों में चकबंदी को गंभीरता से नहीं लिया, तो पलायन की रफ्तार तेज हो जाएगी। और अगर गांव खाली होते गए, तो सीमाओं पर बसे ये इलाके वीरान हो जाएंगे। एक तरफ आजीविका का संकट, दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती…!
क्या हम आने वाले खतरे को देख पा रहे हैं?
सांसद रावत ने केंद्र सरकार से अपील की कि पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक विशेष योजना बनाई जाए, जिससे चकबंदी को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। उनका कहना था—“यह सिर्फ खेती का सवाल नहीं, यह सीमाओं की स्थिरता का सवाल है।”
अब सवाल उठता है—क्या सरकार इस चेतावनी को समय रहते सुनेगी? या फिर उत्तराखंड की ऊंची चोटियों से होती ये आवाजें, धीरे-धीरे खामोशी में बदल जाएंगी?
जवाब वक्त देगा, लेकिन चेतावनी साफ है—या तो कुछ बड़ा कीजिए… या फिर बड़ा खोने के लिए तैयार रहिए।

