गुरुकुल की युवा संसद 2025: जब तर्क बने हथियार और युवाओं ने संभाली लोकतंत्र की बागडोर
मनन ढींगरा
हरिद्वार, 9 अप्रैल 2025 – सुबह का सूरज जैसे ही हरिद्वार के आसमान में चमका, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के परिसर में कुछ अलग ही हलचल थी। आम दिनों की तरह यह सिर्फ एक और सभा नहीं थी – यह था युवा संसद 2025, जहाँ नारे नहीं, तर्क गूंज रहे थे। जहाँ छात्रों ने नेता नहीं, जनप्रतिनिधि बनकर मंच संभाला। और तब शुरू हुआ लोकतंत्र का एक ऐसा रोमांचक अध्याय, जिसकी गूंज देर तक सुनाई देती रही।
दीप प्रज्वलन से आरंभ हुआ यह आयोजन, जैसे कोई ऐतिहासिक सत्र खुला हो। मंच पर थे विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. हेमलता, रजिस्ट्रार प्रो. सुनील कुमार और हरिद्वार से विधायक मदन कौशिक। लेकिन असली कहानी तो तब शुरू हुई, जब सभागार में बैठे छात्रों ने संसद का रूप लिया।
सत्र एक: जब मुद्दे जज़्बात बन गए
पहला सत्र जैसे ही शुरू हुआ, मानसी भार्गव ने “एक राष्ट्र, एक चुनाव” पर अपनी बात रखी – शब्द नहीं, जैसे दृढ़ता की चिंगारी। सागर चौहान ने सोशल मीडिया के पक्ष में ऐसा भाषण दिया कि पूरा सभागार सन्न रह गया – क्या यह मंच एक नई पीढ़ी के नेतृत्व की दस्तक था?
देव सिंह राणा ने जाति जनगणना पर जो सवाल उठाए, वह सिर्फ आंकड़े नहीं थे – वे उस सोच की पड़ताल थी, जो देश की जड़ों से जुड़ी है। सवाल उठे, जवाब दिए गए, लेकिन असल खेल तो अब शुरू होना था।
सत्र दो: जब ज्ञान परंपरा और एआई की टकराहट हुई
अंजलि मौर्य और अनुकेश हलधर ने जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खिलाफ मोर्चा खोला, तो माहौल में एक तनाव था – क्या तकनीक से डर जायें, या उसे दिशा दें? और फिर आया भारतीय ज्ञान परंपरा का पल, जब आलोक कुमार झा ने तक्षशिला और नालंदा को वर्तमान से जोड़ दिया। मयंक सैनी की बातों में भावनाएं थीं, तो अर्जुन की शुरुआत वैदिक मंत्रों से हुई – सभा में जैसे इतिहास ने वर्तमान से हाथ मिलाया हो।
फैसला नहीं, फिक्र थी यहां
यह संसद फैसला देने नहीं बैठी थी, बल्कि सोचने के लिए बाध्य कर रही थी। प्रश्नोत्तर सत्र में हर सवाल में उत्सुकता थी, हर जवाब में खोज। जूरी – डॉ. निखिल रंजन, डॉ. अनुराग वत्स, डॉ. मनीला, डॉ. ऋतु अरोड़ा, डॉ. राहुल भारद्वाज – सबने देखा, सुना और शायद महसूस किया कि यह सिर्फ वाद-विवाद नहीं, एक नवजागरण था।
समापन, लेकिन शुरुआत का संकेत
समापन सत्र में जब संजय चतुर्वेदी, प्रो. राकेश जैन, प्रो. नवनीत और पदम मंच पर आए, तो सिर्फ सम्मान नहीं, एक वचन भी था – इस आवाज़ को थमने नहीं देना है।
इस पूरी युवा संसद का आयोजन डॉ. आर. के. शुक्ला, डॉ. रविंद्र कुमार, डॉ. लोकेश जोशी और डॉ. हिमांशु पंडित के नेतृत्व में हुआ। और यह सिर्फ एक दिन की घटना नहीं थी – यह शुरुआत थी उस संवाद की, जहाँ युवा सिर्फ सुनने वाले नहीं, बोलने वाले भी हैं।
क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ संसद में नहीं होता – वह तब होता है, जब एक छात्र खड़ा होकर कहता है: “मैं पूछूंगा, मैं समझूंगा और मैं बदलूंगा!”

