देहरादून:(जीशान मलिक)देहरादून के एक प्रतिष्ठित मैनेजमेंट कॉलेज से चौथे सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहे 24 वर्षीय आयुष चौधरी का नाम इन दिनों पूरे देश में सुर्खियों में है। सोशल मीडिया पर “पढ़ाई की फीस के लिए किडनी बेचने” की कहानी से शुरू हुआ यह मामला अब एक छात्र की टूटती जिंदगी, गलत फैसलों और संगठित किडनी रैकेट के भयावह सच को उजागर कर रहा है। 30 मार्च 2026 को कानपुर पुलिस द्वारा बड़े किडनी रैकेट का पर्दाफाश होने के बाद आयुष डोनर के रूप में सामने आए।
“बिहार के गांव से देहरादून तक: होनहार छात्र से बिखरते सपनों तक का सफर…
आयुष चौधरी बिहार के बेगूसराय जिले के भगवानपुर थाना क्षेत्र के औगान गांव के मूल निवासी हैं। गांव में उन्हें बचपन से ही होनहार छात्र माना जाता था। 2015 में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की थी। पिता राजेश चौधरी का सपना था कि बेटा डॉक्टर बने। इसी उम्मीद में आयुष को विशाखापट्टनम भेजा गया, जहां वह मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी कर रहे थे।
“विशाखापट्टनम में बदली जिंदगी की दिशा….
विशाखापट्टनम में ही आयुष की जिंदगी ने मोड़ लिया। एक लड़की से दोस्ती हुई और वे हर महीने गांव आने-जाने लगे। धीरे-धीरे गलत संगत में पड़कर पढ़ाई से ध्यान भटका। नशे की लत लग गई और कुछ समय बाद प्रेमिका ने भी साथ छोड़ दिया। यह आयुष के जीवन का पहला बड़ा झटका था।
2017 में बेटे की बिगड़ती आदतों से परेशान पिता राजेश चौधरी ने आत्महत्या कर ली। इस घटना ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया। मां रीता देवी ने बेटे को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आयुष नहीं माने। पिता की मौत के बाद उन्होंने परिवार की लगभग 18 बीघा पैतृक जमीन धीरे-धीरे बेचनी शुरू कर दी।
“शादी भी नहीं बचा सकी जिंदगी…
इसी दौरान सोशल मीडिया के जरिए उनकी मुलाकात यूपी की एक एयर होस्टेस से हुई। दोनों ने देवघर में शादी कर ली। लेकिन शादी के बाद भी आयुष की आदतें नहीं बदलीं। लगातार फिजूलखर्ची और जमीन बेचने से पत्नी परेशान हो गई और कुछ समय बाद वह भी घर छोड़कर चली गई।
2021 में जब आयुष गांव लौटे तो छोटे भाई ने घर में जगह देने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने गांव हमेशा के लिए छोड़ दिया और परिवार से संबंध लगभग टूट गए। मां रीता देवी आज भी गांव में अकेले जीवन बिता रही हैं। इसके बाद आयुष देहरादून आ गए और ग्राफिक एरा मैनेजमेंट कॉलेज से MBA करने लगे।
“कानपुर किडनी रैकेट: 9 लाख का सौदा, मिले सिर्फ 3.5 लाख…
30 मार्च 2026 को कानपुर पुलिस ने एक बड़े अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा किया। पूछताछ में आयुष ने बताया कि उन्होंने 9 लाख रुपये में अपनी किडनी बेचने का सौदा किया था। 16 मार्च 2026 को ऑपरेशन हुआ, लेकिन उन्हें सिर्फ 3.5 लाख रुपये ही मिले।
पुलिस जांच में सामने आया कि आयुष की किडनी मुजफ्फरनगर की 43 वर्षीय पारुल तोमर को ट्रांसप्लांट की गई थी। हैरानी की बात यह है कि ब्रोकर ने पारुल के परिवार से इस ट्रांसप्लांट के लिए 80 लाख रुपये तक वसूले थे।
“कैसे चलता था रैकेट?
पुलिस के मुताबिक यह रैकेट बेहद संगठित तरीके से चल रहा था। सर्जरी के लिए डॉक्टर बाहर से बुलाए जाते थे। आहूजा हॉस्पिटल, मेड लाइफ हॉस्पिटल जैसे निजी अस्पतालों में बिना रजिस्ट्रेशन के अवैध ट्रांसप्लांट किए जाते थे। डोनर्स को टेलीग्राम और व्हाट्सएप के जरिए झांसे में लिया जाता था। आयुष की शिकायत के बाद ही पुलिस इस पूरे नेटवर्क तक पहुंच पाई।
“सिर्फ फीस की मजबूरी नहीं, कहानी के कई पहलू…
शुरुआत में इस पूरे मामले को “एजुकेशन लोन न मिलने और फीस चुकाने की मजबूरी” से जोड़ा गया। लेकिन जांच और गांववालों के बयानों से साफ हुआ कि आयुष पहले ही जमीन बेचकर लाखों रुपये खर्च कर चुके थे। कुछ रिपोर्ट्स में नशे की लत, फिजूलखर्ची और गर्लफ्रेंड की मांगों को भी वजह बताया गया।
अस्पताल में भर्ती आयुष ने पुलिस से बार-बार गुहार लगाई – “मां को मत बताना”। देहरादून से उनकी एक महिला मित्र उनसे मिलने पहुंची तो आयुष फूट-फूटकर रो पड़े।
“फिलहाल अस्पताल में भर्ती, स्थिर है हालत…
आयुष फिलहाल कानपुर के LLR हॉस्पिटल और बाद में लखनऊ के RMLIMS में इलाजरत हैं। डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत अब स्थिर है। पुलिस ने इस मामले में कई ब्रोकर्स, डॉक्टरों और OT टेक्नीशियंस को गिरफ्तार किया है।
आयुष चौधरी की यह कहानी सिर्फ एक छात्र की नहीं, बल्कि बिगड़ते सपनों, टूटते परिवारों और देश में पनप रहे अवैध अंग व्यापार के खतरनाक नेटवर्क की तरफ इशारा करती है। इस घटना ने एक बार फिर पूरे देश में किडनी रैकेट और युवाओं में बढ़ती नशे की लत पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

