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हज्जतुल विदा: जब मैदान-ए-अरफात से उठी बराबरी और भाईचारे की सदा, जाने क्या था नबी पाक का आखरी पैगाम

नई दिल्ली:(जीशान मलिक)हज 2026 के मुबारक मौके पर पूरी दुनिया से लाखों आजमीन-ए-हज बैतुल्लाह शरीफ में इकट्ठा हो रहे हैं। हज सिर्फ इबादत नहीं, बल्कि इंसानियत, बराबरी और भाईचारे का सबसे बड़ा आलमी इज्तिमा है। इसकी बुनियाद पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद ﷺ के उस आखिरी खुत्बे पर है जो आपने 9 जिलहिज्जा 10 हिजरी को मैदान-ए-अरफात में दिया था। इसे ‘खुत्बा हज्जतुल विदा’ कहा जाता है।

“1.40 लाख लोगों के सामने दिया पैग़ाम-ए-इंसानियत”

हजरत मुहम्मद ﷺ ने अपने आखिरी हज के दौरान लगभग 1 लाख 40 हजार सहाबा के मजमे को खिताब करते हुए जो पैग़ाम दिया, वह कयामत तक के लिए पूरी इंसानियत का मंसूर है। आप ﷺ ने फरमाया:

1. जान-माल-इज्जत की हिफाजत:“ऐ लोगो! तुम्हारा खून, तुम्हारा माल और तुम्हारी इज्जत एक-दूसरे पर उसी तरह हराम है जैसे आज के दिन, इस महीने और इस शहर की हुर्मत है।”यानी किसी का कत्ल, चोरी, डाका और इज्जत पर हमला सबसे बड़ा गुनाह है।

2. नस्ल-रंग का भेद खत्म:“किसी अरबी को अजमी पर, किसी गोरे को काले पर कोई फजीलत नहीं। फजीलत सिर्फ तकवे से है।”आप ﷺ ने 1400 साल पहले ही नस्लवाद और रंगभेद की जड़ काट दी थी। हज में काले-गोरे, अमीर-गरीब सब एक ही एहराम में एक साथ सजदा करते हैं।

3. औरतों के हुकूक:“लोगो! औरतों के बारे में अल्लाह से डरो। तुम्हारा औरतों पर हक है और औरतों का तुम पर हक है। उनके साथ बेहतरीन सुलूक करो।” आप ﷺ ने औरत को इज्जत, विरासत और बेहतरीन सुलूक का हक दिया।

4. सूद का खात्मा:“आज से सूद खत्म किया जाता है। सबसे पहले मैं अपने चचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का सूद खत्म करता हूं।”आर्थिक शोषण के खिलाफ यह सबसे बड़ा एलान था।

5. आपसी भाईचारा: “तमाम मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं। किसी के लिए अपने भाई का माल उसकी रजामंदी के बगैर हलाल नहीं।”

6. कुरआन और सुन्नत से वाबस्तगी:“मैं तुम्हारे दरमियान दो चीजें छोड़कर जा रहा हूं: अल्लाह की किताब और मेरी सुन्नत। इन्हें मजबूती से थामे रहोगे तो कभी गुमराह नहीं होगे।”

हजरत मुहम्मद ﷺ का यह आखिरी पैग़ाम ही हज की रूह है। लब्बैक की सदा लगाते हुए जब हर रंग, हर मुल्क, हर जबान का इंसान एक साथ काबे का तवाफ करता है, अरफात में ठहरता है, तो दुनिया को बराबरी और इंसानियत का सबसे बड़ा पैग़ाम मिलता है।आज जब दुनिया जंग, नफरत और नस्लभेद की आग में जल रही है, नबी-ए-करीम ﷺ का यह आखिरी खुत्बा अमन, इंसाफ और भाईचारे का रौशन चिराग है। हज पर जाने वाला हर आजमीन इस पैग़ाम का अमीन बनकर लौटता है।”आपको बताते चले नबी करीम ने फरमाया ऐ लोगो! मेरी बात गौर से सुनो, शायद आइंदा साल मैं तुमसे यहां न मिल सकूं।”— यह कहकर आप ﷺ ने दुनिया को इंसानियत का आखिरी दस्तूर दे दिया।

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