यमुना की पुकार: क्या हम सुन रहे हैं उसकी करुणा भरी आवाज़?
ऋषिकेश,मनन ढींगरा
22 मार्च – एक गहरी रात, जब सब कुछ शांत था, यमुना की लहरें शायद रो रही थीं—सिसक रही थीं अपने अस्तित्व की लड़ाई में। प्रदूषण, कचरा और उपेक्षा ने उसकी निर्मलता को ग्रहण लगा दिया है। लेकिन क्या अब भी समय है उसे बचाने का?
परमार्थ निकेतन में इस सप्ताह यह तीसरी महत्वपूर्ण बैठक थी। स्वामी चिदानन्द और अन्य संतों ने यमुना के अस्तित्व पर गहरी चिंता व्यक्त की। एक स्वर में सबने कहा, “अब बहुत हुआ, यमुना को बचाना ही होगा!”
स्वामी चिदानन्द की गंभीर आवाज़ गूँजी – “नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, वे हमारी सभ्यता की धमनियाँ हैं। यदि हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी।”
उनकी बातों में एक चेतावनी थी—एक ऐसा सच, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब असंभव है। जल संकट दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नदियाँ सिकुड़ रही हैं, और यदि हम अभी भी नहीं जागे, तो यह सन्नाटा तबाही का पूर्वाभास होगा।
भगवान कृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं में यमुना से जो प्रेम किया, क्या हम उसे बचा नहीं सकते? वृंदावन की यमुना, जो कभी कृष्ण के चरणों से पवित्र हुई थी, आज उसकी निर्मलता संकट में है। वह हमें पुकार रही है—क्या हम उसकी करुण पुकार सुन रहे हैं?
इस विश्व जल दिवस पर, यह सिर्फ़ एक औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि एक आह्वान था—एक संकल्प लेने का समय, कि हम जल संरक्षण के लिए अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँगे। क्योंकि यदि आज हमने यमुना को नहीं बचाया, तो कल शायद हमारे पास केवल उसकी यादें ही बचेंगी… और एक मूक पछतावा!

