ऋषिकेश में दिव्य भेंटवार्ता: यमुना बचाने की एक पवित्र प्रतिज्ञा!
ऋषिकेश,मनन ढींगरा
21 मार्च – आध्यात्मिकता और समाजसेवा के संगम पर, जब परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती और पद्मश्री अभिनेत्री एवं सांसद हेमामालिनी आमने-सामने बैठे, तो वातावरण में एक विशेष ऊर्जा का संचार होने लगा। यह सिर्फ एक भेंटवार्ता नहीं थी, बल्कि यमुना नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए एक क्रांतिकारी संकल्प का क्षण था।
हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति की जीवनरेखा रही यमुना नदी आज गंभीर संकट में है। उसका निर्मल प्रवाह अब प्रदूषण के काले साये में सिसक रहा है। जल की पवित्रता धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है, और किनारे, जो कभी हरियाली से भरपूर थे, अब कचरे और शहरी गंदगी से ढके हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने जब कहा— “अगर यमुना नहीं बची, तो संस्कृति नहीं बचेगी, आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी!”— तो हर शब्द में एक चेतावनी छिपी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब केवल चर्चा का समय नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का क्षण आ चुका है।
पेड़ बचाओ, नदियां बचाओ, जीवन बचाओ!
स्वामी ने एक संकल्प उठाने की अपील की— यमुना को पुनर्जीवित करने के लिए वृक्षारोपण और जल शोधन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने चेताया कि “अगर जंगल समाप्त हो गए, तो नदियां भी सूख जाएंगी, और जब नदियां सूख जाएंगी, तो जीवन की सांसें भी थम जाएंगी।”
हेमामालिनी, जिनकी आंखों में यमुना को स्वच्छ देखने का सपना झलक रहा था, ने इस अभियान को अपना समर्थन दिया। उन्होंने कहा, “यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी मां है। हम इसे ऐसे ही मरने नहीं दे सकते।”
इस महत्वपूर्ण चर्चा में यह निर्णय लिया गया कि सरकार, स्थानीय निकायों और समाज को मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ाना होगा। नदियों के किनारे वृक्षारोपण किया जाएगा, गंदे नालों को यमुना में मिलने से रोका जाएगा, और हर स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती के शब्दों में— “हमारे पास ज्यादा समय नहीं बचा। यह अब या कभी नहीं का समय है। अगर हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें दोष देंगी।”
