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पाँच दिवसीय रोवर्स-रेंजर्स जाँच शिविर का रंगारंग अंत

 पाँच दिवसीय रोवर्स-रेंजर्स जाँच शिविर का रंगारंग अंत

भोपालपानी के शांत वनों के बीच, जहाँ सुबह की धूप भी पेड़ों की फुनगियों से चुपके से उतरती है—वहीं बीते पाँच दिनों से एक विशेष ऊर्जा संचित हो रही थी। उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के प्रादेशिक प्रशिक्षण केंद्र में चल रहे रोवर्स-रेंजर्स निपुण शिविर का आज हुआ समापन… लेकिन यह कोई साधारण विदाई नहीं थी।

एक समापन जो शुरुआत का संकेत दे गया।

1 अप्रैल से 5 अप्रैल 2025 तक चला यह शिविर, रोवर्स-रेंजर्स के लिए महज एक प्रशिक्षण नहीं, बल्कि आत्मा को झकझोर देने वाला अनुभव था। हर गतिविधि, हर परीक्षा, हर शपथ—जैसे किसी बड़े रहस्य की परतें धीरे-धीरे खुल रही हों।

और फिर आया वह क्षण, जब ग्राउंड कैंप फायर की आग में न सिर्फ लकड़ियाँ जलीं, बल्कि हर प्रतिभागी के भीतर कुछ नया भी सुलगा। मुख्य अतिथि संजय कुमार पाण्डेय, उपकुलसचिव, उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय ने अपने शब्दों से जैसे उन सभी के भीतर भविष्य की लौ जला दी—एक आश्वासन, एक आशीर्वाद।

174 आए… 173 ने पार की परीक्षा की अग्नि।

बस एक, जो रह गया… उस एक की अनुपस्थिति ने जैसे पूरे शिविर में एक अनकही उत्सुकता भर दी—क्यों नहीं आया वह? कहाँ गया वह?

लीडर ऑफ इवेंट  गायत्री (रेंजर विंग) और प्रो. सत्येंद्र कुमार (रोवर विंग) ने बताया—इस बार की संख्या अभूतपूर्व थी। और अब ये सभी प्रतिभागी, नौ माह के इंतज़ार के बाद, राज्य पुरस्कार के लिए अपनी यात्रा शुरू करेंगे। कौन होगा वह जो अन्ततः राज्य पुरस्कार का ताज पहनेगा? कौन चमकेगा भविष्य के सितारों में?

17 राजकीय महाविद्यालयों से आए रोवर्स-रेंजर्स ने इस शिविर को एक छोटे भारत का रूप दे दिया। काशीपुर से लेकर ऋषिकेश, पुरोला से लेकर गोपेश्वर तक, हर कोना जैसे एक सुर में गूंज उठा।

शिविर में मौजूद अनुभवी शिक्षकों और प्रशिक्षकों की सूची खुद में एक गाथा है—एक से बढ़कर एक नाम, जैसे ज्ञान के प्रहरी खड़े हों। और स्टाफ़, जिनकी चुपचाप सेवा ने इस आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन शिविर खत्म नहीं हुआ… यह तो एक बीज था, जो अब भविष्य में पल्लवित होगा।

हर प्रमाण पत्र के साथ, एक कहानी जुड़ गई। हर रंगारंग प्रस्तुति के पीछे, महीनों की मेहनत छुपी रही। और हर चेहरा, अब एक सवाल बनकर उभरा—

“क्या आप तैयार हैं? अगली चुनौती के लिए? अगली यात्रा के लिए?”

क्योंकि जैसे किसी ने कहा—

ज़िंदगी का अवसर बस एक बस स्टॉप की तरह होता है… थोड़ी देर रुकता है, फिर चल देता है।

क्या आपने वह बस पकड़ ली?

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