सुनसान सन्नाटे के बीच गूंजे वेदमंत्र, ऋषिकेश में धर्म की गूंज से काँप उठा वातावरण…
मनन ढींगरा | ऋषिकेश, 21 अप्रैल
सोमवार की सुबह थी, पर यह कोई आम सुबह नहीं थी…
जीवनी माई मार्ग स्थित श्री कृष्ण भवन के वार्षिकोत्सव कार्यक्रम ने ऋषिकेश को आध्यात्मिक ऊर्जा से झंकृत कर दिया। एक दिव्य उपस्थिति, एक गरिमामयी आगमन… और फिर वातावरण में अचानक एक शांति—जो तूफान से पहले की प्रतीत हो।
जैसे ही आचार्य महामंडलेश्वर जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद महाराज ने श्री कृष्ण भवन की पावन भूमि पर पदार्पण किया, तुलसी मानस मंदिर के महंत रवि प्रपन्नाचार्य के स्वर में गंभीरता आ गई। वेदमंत्रों की ध्वनि गूंजने लगी और ऋषि कुमारों ने एक स्वर में महाराज का स्वागत किया—पर जैसे यह कोई साधारण स्वागत न हो… यह था एक आह्वान धर्म जागरण का।
नवीन शर्मा, श्री कृष्ण भवन समन्वय सेवा ट्रस्ट के प्रबंधक, और महंत वत्सल प्रपन्नाचार्य महाराज ने पुष्पहार और शॉल अर्पित कर महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया। परंतु इसी क्षण, महाराज ने जो कहा, वह सभा को ठिठका गया…
“यदि धर्म रहेगा, तभी संस्कृति बचेगी। सनातन की लौ बुझी तो अंधकार घना हो जाएगा…”
बाल आश्रम से वानप्रस्थ तक की यात्रा, और उसके बीच माया व धर्म का जटिल संबंध—महाराज की वाणी में एक चेतावनी थी… एक संकेत था… और शायद, एक युग परिवर्तन की आहट।
भारत माता मंदिर, हरिद्वार के प्रबंधक आर.डी. शास्त्री ने संत सम्मेलन में उपस्थित समस्त संतों व अतिथियों का स्वागत किया। पर कहीं न कहीं, सबकी दृष्टि महाराज के मुख की ओर ही थी—क्या वह कोई और रहस्य उद्घाटित करेंगे?
इस पावन अवसर पर शहर के कई गणमान्य जन उपस्थित थे—अनिता ममगाई, दीप शर्मा, नवल कपूर, पंडित वेद प्रकाश शर्मा और अनेकों संतजन—परंतु हर चेहरा जैसे किसी अदृश्य भविष्य की ओर ताक रहा था…
क्यों?
क्या ऋषिकेश फिर किसी महायात्रा का आरंभ स्थल बनने वाला है?
या धर्म के पुनर्जागरण की यह चिंगारी कहीं बहुत गहराई तक धधकने वाली है?
समय ही बताएगा। लेकिन इतना तो निश्चित है—श्री कृष्ण भवन की इस रात ने ऋषिकेश को झकझोर दिया है… भीतर तक।

