नई दिल्ली (ज़ीशान मलिक): मुसलमानों का एक प्रमुख पर्व ईद-उल-अजहा (जिसे आमतौर पर बकरीद या कुर्बानी की ईद कहा जाता है) भारत में 7 जून 2025 को मनाया जाएगा। यह घोषणा तब हुई जब बुधवार, 28 मई 2025 को देश के विभिन्न हिस्सों में जिलहिज्जा (धुल-हिज्जा) का चाँद देखा गया। इसी के साथ इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने की शुरुआत हो गई।
बकरीद इस्लाम धर्म के उन त्योहारों में से एक है जो पूरी तरह से चंद्रमा के दर्शन पर निर्भर होते हैं। जिलहिज्जा का चाँद दिखने के बाद अब चाँद की 10वीं तारीख 7 जून को देशभर में बकरीद मनाई जाएगी।
इस अवसर पर मुस्लिम समुदाय हज़रत इब्राहीम (अलैहिसलाम) की अल्लाह के प्रति वफादारी और बलिदान की याद में जानवर की कुर्बानी देता है। यह पर्व त्याग, भक्ति और इंसानियत के लिए समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
देशभर की मस्जिदों और धार्मिक संगठनों ने भी चाँद दिखाई देने की पुष्टि की है और लोगों से 7 जून को ईद-उल-अजहा की नमाज अदा करने और कुर्बानी के इस खास दिन को सादगी और भाईचारे के साथ मनाने की अपील की है।
क्यों मनाई जाती है बकरा ईद-:
यह त्योहार पैगंबर इब्राहिम (अब्राहिम) की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, पैगंबर इब्राहिम को नींद में आए एक सपने में अल्लाह ने अपने किसी सबसे प्रिय चीज को कुर्बान करने को कहा। इसके बाद पैगंबर इब्राहिम बहुत सोच में पड़ गए आखिर क्या कुर्बान किया जा सकता है? बहुत सोचने विचारने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि उनके लिए सबसे प्रिय उनका बेटा है। ऐसे में अब उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का मन बना लिया।
जब अपने बेटे को कुर्बानी के लिए लेकर जा रहे थे तो उनके रास्ते में एक शैतान मिला जो बोला कि आप अपने बेटे की बली क्यों दे रहे हैं। अगर आपको देना ही है तो किसी जानवर की बली दे दीजिए। इस बात पर पैगंबर इब्राहिम ने बहुत देर तक सोचा और फिर इस नतीजे पर पहुंचे कि अगर मैं अपने बेटे की बजाय किसी और का कुर्बानी देता हूं तो ये अल्लाह के साथ धोखा करना होगा। इसलिए उन्होंने बेटे को ही कुर्बान करने का निर्णय लिया। जब बेटे की कुर्बानी देने की बारी आई तो उनके पिता होने का मोह उन्हें परेशान करने लगा। इसलिए पैगंबर इब्राहिम ने आंखों पर पट्टी बांधकर उसके बाद अपने बेटे की कुर्बानी दी। मगर हैरान करने वाली बात ये थी की जब उन्होंने अपनी आंखों से कपड़े की पट्टी हटाई तो देखा की उनका बेटा सही सलामत खड़ा है और बेटे की जगह पर किसी बकरे की कुर्बानी हो गई है। इसी घटना के बाद से मुस्लिम समुदाय में बकरा कुर्बान करने का चलन शुरू हो गया।
तीन हिस्सों में बटता है बकरे का गोश्त-:
अगर ध्यान से देखा जाए तो यह त्योहार त्याग, समर्पण और आस्था का प्रतीक है। मुस्लिम समुदाय के लोग इस दिन अपनी हैसियत के अनुसार कुर्बानी देते हैं।और गरीबों और जरूरतमंदों को मांस बांटते हैं, कुर्बानी का गोश्त तीन भागों में बांटा जाता है। एक भाग गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है। दूसरा भाग रिश्तेदारों और दोस्तों को दिया जाता है, और तीसरा भाग खुद रखा जाता है। ये त्योहार गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने और समाज में भाईचारे और सद्भावना को बढ़ावा देने की प्रेरणा देता है।

